Tuesday, March 6, 2012

विरह के पल...
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जीवन तो तेरे रंग में रंगा है,इसपे चढ़े न दूजा रंग,
फिर लाल, हरा, पिला, नीला, क्या करूँगा इनके संग,
ये कान्हा की कैसी मजबूरी है, अबकी राधा के संग दूरी है,
जब मन कही और तन कही हो, तो काहे की हुड़दंग,

अबकी बार मन कुछ विचलित है, कैसे करे मलंग,
रह-रह कर एक विरह वेदना, कर देती दिल को तंग,
याद आती फिर पिछली होली, इनकार की वो मीठी बोली,
अब रेतीले चारदीवारियों में, मैं ढूँढू प्यार के रंग,

जीवन तो तेरे रंग में रंगा है,इसपे चढ़े न दूजा रंग,
फिर लाल, हरा, पिला, नीला, क्या करूँगा इनके संग,
                                                           दिलवाला...