Wednesday, December 8, 2010

ख्वाबों का सवेरा...

वादा है की हम जहाँ भी जायेंगे...
आपके ख्वाबों की सुबह लायेंगे,

क्या हुआ जो दुनियां ने छोड़ दिया हमको,
क्या हुआ जो अपनों ने तोड़ दिया हमको,
है हौशला अब भी जहान बदलने का,
इस आग के दरिया को पार करने का...

बस, एक, साथ आपका हमे चाहिए,
विश्वाश का एक हाथ हमे चाहिए,

फिर राम का साम्राज्य आप पाएंगे...
वादा है....
 की हम जहाँ भी जायेंगे...
आपके ख्वाबों की सुबह लायेंगे..

Sunday, November 21, 2010

चाँद की ख्वाहिश....

निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है,
तेरी गोद में रख सिर अपना आज सोना चाहता है..
सांप सी काली लटों में डूबती हर साँझ की,
लालिमामय लाल चिलमन को संजोना चाहता है...
निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है...

संजू को तब रंज होगा,जब सुनेगी हाल ये,
की हाल-ए-दिल तेरे तब्बसुम का फ़साना चाहता है...
मेमाचा सी आ गई है,कोई आज शायद जिंदगी में,
अपनी सांसों की सरगम पे,उसको भी बसाना चाहता है..
निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है...

स्मृति तो होती है चंचल दिल ऐसा मानता है,
जुगनूँ भी अहसास की शम्मां जलना चाहता है...
और ऐसी एक अहसास में दिल,आज जलना चाहता है,
निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है...

दिलवाला...

Friday, November 19, 2010

...तन्हाई....??

तन्हाई कुछ समझती नहीं ,
अक्सर कुछ समझाती है...
जब दिल में भरा हो प्यार बहुत ,
तो अक्सर ये आ जाती है...
दिल में रहने वाला कोई ,
पास नहीं जब होता है..
तो रोती है आँखें बिफर बहुत ,
या सुकून बहुत पा जाती हैं..

बिछड़ा प्यार याद आता है ,
या गहरी सोच बुलाती है...
तब तन्हाई का गौर वर्ण ,
या नीली आँखें दिख जाती है..
'दिलवाले' को कोई बता दो ,
की कैसी ये आ जाती है...
मै अकेला हो जाता हूँ,
या ये अकेले में ले जाती है...

अगर पता हो तो ये भी बताओ ,
अक्सर चीजों को खोजने-वाले ,
तन्हा ही क्यों रहते है ,
और प्यार करने-वाले ,
क्यों तन्हाई से डरते है...

दिलवाला...

Sunday, November 14, 2010

मुझे अब भी याद आता है...

माँ की लोरियां,दादा जी के कंधे...
दादी की कहानियां,बाबु जी का प्यार...
तुम मानो या न मानो ,मुझे अब भी याद आता है...
वो बचपन की शरारतें...
और ,माँ के रुखी हुई हाथो की मार..

वो अमरुद के बहाने ,उसकी आँगन में जाना ..
उसे साथ ले जाने के लिए ,रस्ते में डरते हुआ जाना...
वो बगीचे की डालियाँ ,वो झूले का प्यार...
तुम मानो या न मानो ,मुझे अब भी याद आता है...
वो बचपन की शरारतें...
और ,माँ के रुखी हुई हाथो की मार..

उससे मिलने के लिए ,स्कुल से भाग आना...
किसी-किसी बहाने से ,नंगे पाँव भूतिया पीपल तक जाना...
वो मिटटी के घरौदे ,वो गुड्डे-गुड्डी का प्यार...
तुम मानो या न मानो ,मुझे अब भी याद आता है...
वो बचपन की शरारतें...
और ,माँ के रुखी हुई हाथो की मार...

                           दिलवाला....

Monday, November 8, 2010

सहमी सी वफ़ा...

हम तब भी तुम्हारे साथ थे,
जब,जिंदगी तेरी पनाह में थी,
हम अब भी तुम्हारे साथ है,
जब,सहमी सी वफ़ा तेरी निगाहों में है |

जैसे ही जंग को रुख्शत किया,
हमने अपनी जिंदगी से,
परिंदे,दरिन्दे बन खेलने लगे,
हमारे अपनों की जिंदगी से,
वक़्त ने खेला खेल जो भी हमारे साथ साथी,
उन सब का सिला हमारी अदाओं में है...
हम अब भी तुम्हारे साथ है,
जब,सहमी सी वफ़ा तेरी निगाहों में है |

अब दंगे में दंगल का मज़ा,
कब तक उठायें लोग,
बैठे है यूँ ही दिल में,
इंसानियत दबाये लोग,
अब इंसान की इंसानियत को क्या देखें,
जब आवाम ही दहशत की फिजाओं में है,
हम अब भी तुम्हारे साथ है,
जब,सहमी सी वफ़ा तेरी निगाहों में है |

                                         दिलवाला...

Thursday, November 4, 2010

बदलती नहीं है हाथ की रेखाएं...


हमेसा सोचता था की किस्मत क्या है ?
इसे तो इंसान खुद अपने कर्मों से लिखता है..
कुछ नहीं होती है हाथ की रेखाएं ,
इसे हम जब चाहे बड़ा और छोटा कर सकते है..
फिर मन में ख्याल आया..
की फिर कोई किसी से दूर क्यों हो जाता है..?
क्यों अमीरों की अमीरी और,
गरीबों की गरीबी बढ़ती जाती है..
शायद सारा जड़ है ये हाथ और
हाथों की ये रेखाएं..
क्यों इस हाथ को ही काट दें..
रहेगा हाथ और रहेंगी ये रेखाएं..
अचानक,
पीछे से आवाज़ आई ...
बाबु ....जी...
मैं पलटा और देखा की एक भिखारी खड़ा है,
उसके दोनों हाथ नहीं थे,
मैंने मन में सोचा,
कहाँ गई इसकी हाथ की रेखाएं ,
इसके पास तो हाथ भी नहीं है,
फिर...
अचानक उसने कुछ सोचा और बोला..
बाबु जी ये रेखाएं मिटती नहीं है ..
सिर्फ अपना जगह बदल लेती है..
अब देखिये ...
हाथ नहीं है तो अब ये माथे पे गई है..
फिर मुस्कुराया...
और कलेजे के दो टूक कर गया ..
वो किस्मत का मारा...

Monday, November 1, 2010

दीये की ख्वाहिश...

हमने सही है तपन की,तू रौशन हो,
जलाया खुद का बदन,की तेरी आँखें नम न हो,
प्यार सबसे मिले हर जगह पे तुझे,
तेरी शोहरत शहर में कभी कम न हो,

गर पतंगें जले तो जल जाएँ वो,
तेरी महफ़िल की रौनक कभी कम न हो ,
तेरे जिंदगी में हों,हर वक़्त उजाले,
हम पिघलते रहे,ये सितम कम न हो,

मेरा तल का अँधेरा,न रोक सकता मुझे,
ये धर्मों की दीवारे न रोक सकतीं तुझे,
की जब तक है मुझमे यूँ जलने की ताकत,
रौशनी की ये कोशिश कभी कम न हो,

हमने सही है तपन की तू रौशन हो,
प्यार सबसे मिले हर जगह पे तुझे,
तेरी शोहरत शहर में कभी कम न हो.....

दोस्तों !
मेरी ये चौथी कविता है जिसमे दिवाली के उपलक्ष्य में एक नन्हे दीये की ख्वाहिशों ,उसके संदेशों को ,आप तक पहुंचाने की एक छोटी कोशिश की जा रही है उम्मीद है आपको पसंद आएगी...
धन्यवाद् !
आपके ध्यान में निरंतर..
आपका..
दिलवाला...

Sunday, October 31, 2010

दीयों को जलाना पर दिल को नहीं,...

दिल से दिल को मिलाना,जो न दिखे कहीं,
दीयों को जलाना पर दिल को नहीं,
थक गई है ये आँखे,जो न देखे कहीं,
नफरतों की ये आग कभी बुझती नहीं..

वक़्त संग में है तेरे,दिल मिलाना जरुर,
प्यार का ये दिया,तुम जलाना जरुर,
हिंद से पाक,औ पाक से हिंद को मिलाना यूँ आसान नहीं,
गर आसान नहीं,तो यूँ मुस्किल भी नहीं,

सिर्फ लफ्ते-जिगर में हौशला चाहिए,
दिलवाले के संग काफिला चाहिए,
ये दुनियां को दिखाना जो न दिखता कहीं,
दीयों को जलाना पर दिल को नहीं....



दोस्तों !
          बार-बार ये सोचता हूँ,की हमने मंदिरों में और मस्जिदों में अब तक कितने दिए जलाये है,मगर दिल में आज भी वो ही घुप्प अँधेरा छुपाये बैठे है,अक्सर ये होता है की दिवाली में दिए कम दिल ज्यादा जलते है... कुछ दिल सरहद के उस पार तो कुछ दिल सरहद के इस पार,और कुछ तो अपनी सरहदों में रह कर भी सरहद पे जलते है...जब दिल का या हमारे शारीर के किसी भी हिस्से का प्रतिरोपण करना होता है तो हमारा ध्यान कभी भी जाति-विशेष या स्थान-विशेष की ओर नहीं जाता.. क्योंकि शायद उस वक़्त हम जरुरत में होते है...मगर जरूरतें पूरी होने के बाद...फिर से वोही...
             तो इस दिवाली पे आपसे बस इतनी गुज़ारिश है...की इस दिलवाले को सफ़र में एक काफिले की तलाश है...उम्मीद है की आप उसकी तलाश को ...
  आपके ध्यान में निरंतर...
   आपका..
दिलवाला..

Saturday, October 30, 2010

....दर्दे-बारात....

मुझको हर पल तेरी यादों में,
प्यारी तेरी हर बात लगी,
तन्हाई के मौसम में भी,
महफ़िल सी सौगात लगी,
तारीफ नूर की जहाँ भी चली,
तुझमे बढ़कर हर बात मिली..

आफशोस नहीं इसका हमने,
इज़हार नहीं किया तुमसे,
इत्तेफाक की जब भी मिला तुमसे,
तब लोगों की जामात मिली....
दुनियां का साथ तुमने भी दिया,
और मुझको दर्दे-बारात मिली....


दोस्तों !
        ये मेरी दूसरी कविता है जो मै आप सबकी नज़र पेश कर रहा हूँ .. उम्मीद है की आपकी पुरानी कुछ यादें तारो-ताज़ा हो जाएँगी.. और आपके अन्दर छुपे हुए दिलवाले की धड़कने आपको फिर से पिछली यादों में ले जाएँगी...
  धन्यवाद !
आपके धड़कनों की ध्यान में निरंतर...
  आपका...
दिलवाला..

Friday, October 29, 2010

....ख्याल ....

हमे हर वक़्त सिर्फ उनका ख्याल है,
इसलिए नहीं की मेरा प्यार बेमिसाल है,

कांटे चमन के कफ़न है हमारे,
गुलाबों से उनकी जिंदगी खुशहाल है,
प्यार करने की जग में इजाजत नहीं,
उनको याद करना भी एक सवाल है,

दुनिया-वाले जुदाई की देंगे सजा ,
गर पता चल गया हमे किसका ख्याल है....


यूँ तो अक्सर ख्याल मन में आते रहते है,लेकिन खयालों को शब्दों की मोतियों से सजाना एक अलग बात है... और इस कला में निपुण मेरे गुरु स्वर्गीय श्री हरिवंश राय बच्चन (मेरे दिल ने उनको ही अपना गुरु मन है...हालाँकि मैंने उनको न तो देखा है और न उनके बारे में ज्यादा जानता हूँ...मगर फिर भी उनकी मधुशाला हर एक की जिंदगी का दर्शन है ऐसा मेरा मानना है...)हैं ,उम्मीद है की मेरी ये पहली कविता आप लोगों को पसंद आएगी और मुझे आगे लिखने के लिए प्रेरित करेंगे..
आपके ख्वाब में निरंतर
आपका,
दिलवाला...