Thursday, April 21, 2011

प्रियतमा आज तुम कुछ अलग सी लगी...

प्रियतमा आज तुम कुछ अलग सी लगी,
देखी नहीं थी मैंने अब तक ऐसी दिल्लगी,

कभी कलम से गुस्ताखी,तो कभी नज़र का तीर,
कितना बचता कोरा दिल,और कैसे सहता पीर,
बस ह्रदय पे नाम लिख दिया प्रियतमा तेरे आँखों ने,
पल में ही ये दिल खो गया तेरी मीठी यादों में,
इस शांत ह्रदय में ऐसी आग कभी पहले नहीं लगी,

प्रियतमा आज तुम कुछ अलग सी लगी...

सपने में तुम रोज़ आती थी, बन परियों की शहजादी,
और अचानक घुप्प अँधेरा, बन जाता आफताबी,
खुले केश तेरे गालों पे ऐसा दृश्य हैं गढ़ देते,
बादलों पे छुपा चाँद, आ रहा हो बन माहताबी,
वो हल्कि मुस्कान तुम्हारी, पहले ऐसी नहीं लगी,

प्रियतमा आज तुम कुछ अलग सी लगी...

                                              दिलवाला....

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