Sunday, October 31, 2010

दीयों को जलाना पर दिल को नहीं,...

दिल से दिल को मिलाना,जो न दिखे कहीं,
दीयों को जलाना पर दिल को नहीं,
थक गई है ये आँखे,जो न देखे कहीं,
नफरतों की ये आग कभी बुझती नहीं..

वक़्त संग में है तेरे,दिल मिलाना जरुर,
प्यार का ये दिया,तुम जलाना जरुर,
हिंद से पाक,औ पाक से हिंद को मिलाना यूँ आसान नहीं,
गर आसान नहीं,तो यूँ मुस्किल भी नहीं,

सिर्फ लफ्ते-जिगर में हौशला चाहिए,
दिलवाले के संग काफिला चाहिए,
ये दुनियां को दिखाना जो न दिखता कहीं,
दीयों को जलाना पर दिल को नहीं....



दोस्तों !
          बार-बार ये सोचता हूँ,की हमने मंदिरों में और मस्जिदों में अब तक कितने दिए जलाये है,मगर दिल में आज भी वो ही घुप्प अँधेरा छुपाये बैठे है,अक्सर ये होता है की दिवाली में दिए कम दिल ज्यादा जलते है... कुछ दिल सरहद के उस पार तो कुछ दिल सरहद के इस पार,और कुछ तो अपनी सरहदों में रह कर भी सरहद पे जलते है...जब दिल का या हमारे शारीर के किसी भी हिस्से का प्रतिरोपण करना होता है तो हमारा ध्यान कभी भी जाति-विशेष या स्थान-विशेष की ओर नहीं जाता.. क्योंकि शायद उस वक़्त हम जरुरत में होते है...मगर जरूरतें पूरी होने के बाद...फिर से वोही...
             तो इस दिवाली पे आपसे बस इतनी गुज़ारिश है...की इस दिलवाले को सफ़र में एक काफिले की तलाश है...उम्मीद है की आप उसकी तलाश को ...
  आपके ध्यान में निरंतर...
   आपका..
दिलवाला..

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