हमेसा सोचता था की किस्मत क्या है ?
इसे तो इंसान खुद अपने कर्मों से लिखता है..
कुछ नहीं होती है हाथ की रेखाएं ,
इसे हम जब चाहे बड़ा और छोटा कर सकते है..
फिर मन में ख्याल आया..
की फिर कोई किसी से दूर क्यों हो जाता है..?
क्यों अमीरों की अमीरी और,
गरीबों की गरीबी बढ़ती जाती है..
शायद सारा जड़ है ये हाथ और
हाथों की ये रेखाएं..
क्यों न इस हाथ को ही काट दें..
न रहेगा हाथ और न रहेंगी ये रेखाएं..
अचानक,
पीछे से आवाज़ आई ...
बाबु ....जी...
मैं पलटा और देखा की एक भिखारी खड़ा है,
उसके दोनों हाथ नहीं थे,
मैंने मन में सोचा,
कहाँ गई इसकी हाथ की रेखाएं ,
इसके पास तो हाथ भी नहीं है,
फिर...
अचानक उसने कुछ सोचा और बोला..
बाबु जी ये रेखाएं मिटती नहीं है ..
सिर्फ अपना जगह बदल लेती है..
अब देखिये न ...
हाथ नहीं है तो अब ये माथे पे आ गई है..
फिर मुस्कुराया...
और कलेजे के दो टूक कर गया ..
वो किस्मत का मारा...
वो किस्मत का मारा...
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