Sunday, November 21, 2010

चाँद की ख्वाहिश....

निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है,
तेरी गोद में रख सिर अपना आज सोना चाहता है..
सांप सी काली लटों में डूबती हर साँझ की,
लालिमामय लाल चिलमन को संजोना चाहता है...
निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है...

संजू को तब रंज होगा,जब सुनेगी हाल ये,
की हाल-ए-दिल तेरे तब्बसुम का फ़साना चाहता है...
मेमाचा सी आ गई है,कोई आज शायद जिंदगी में,
अपनी सांसों की सरगम पे,उसको भी बसाना चाहता है..
निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है...

स्मृति तो होती है चंचल दिल ऐसा मानता है,
जुगनूँ भी अहसास की शम्मां जलना चाहता है...
और ऐसी एक अहसास में दिल,आज जलना चाहता है,
निशि तेरे आगोश में ये चाँद खोना चाहता है...

दिलवाला...

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