Monday, November 1, 2010

दीये की ख्वाहिश...

हमने सही है तपन की,तू रौशन हो,
जलाया खुद का बदन,की तेरी आँखें नम न हो,
प्यार सबसे मिले हर जगह पे तुझे,
तेरी शोहरत शहर में कभी कम न हो,

गर पतंगें जले तो जल जाएँ वो,
तेरी महफ़िल की रौनक कभी कम न हो ,
तेरे जिंदगी में हों,हर वक़्त उजाले,
हम पिघलते रहे,ये सितम कम न हो,

मेरा तल का अँधेरा,न रोक सकता मुझे,
ये धर्मों की दीवारे न रोक सकतीं तुझे,
की जब तक है मुझमे यूँ जलने की ताकत,
रौशनी की ये कोशिश कभी कम न हो,

हमने सही है तपन की तू रौशन हो,
प्यार सबसे मिले हर जगह पे तुझे,
तेरी शोहरत शहर में कभी कम न हो.....

दोस्तों !
मेरी ये चौथी कविता है जिसमे दिवाली के उपलक्ष्य में एक नन्हे दीये की ख्वाहिशों ,उसके संदेशों को ,आप तक पहुंचाने की एक छोटी कोशिश की जा रही है उम्मीद है आपको पसंद आएगी...
धन्यवाद् !
आपके ध्यान में निरंतर..
आपका..
दिलवाला...

3 comments:

  1. kya mast kavita likhi hai bhaiya.

    vinit kumar

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  2. bahut pyara kavita hai bhya...bahut acha feel hua.aapne kuch hat ke toh kiya...agar aise hi chalta raha toh aapki book jarur nikekegi

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  3. thank you..
    उम्मीद है आप इसे जरुर समझ कर अपनाएंगे..

    "उम्मीद का दामन ही है हर माँ का दामन..
    बेटों का बदन ही है हर बाप का चमन..
    हर माली तराशता है अपने गुलाबों को..
    तब जा कर मिलती है ,ख़ुशी हम सबों को..."
    ....दिलवाला...

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